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सौ सलाम: निर्देशक ससी की 'नूरु सामी' क्यों तमिल सिनेमा की अंतरात्मा को झकझोर रही है

“இயக்குநர் சசிக்கு 100 சல்யூட்...” - ஹலிதா ஷமீம் பாராட்டு!

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 21 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
सौ सलाम: निर्देशक ससी की 'नूरु सामी' क्यों तमिल सिनेमा की अंतरात्मा को झकझोर रही है
सौ सलाम: निर्देशक ससी की 'नूरु सामी' क्यों तमिल सिनेमा की अंतरात्मा को झकझोर रही है

निर्देशक हलिता शमीम ने ससी-विजय एंटनी की इस फिल्म की प्रशंसा करने वाले लोगों की कतार में शामिल होते हुए इसे कठिन घरेलू विषयों पर चर्चा शुरू करने वाला एक साहसी कदम बताया है।

नूरु सामी की स्पेशल स्क्रीनिंग के दौरान माहौल बेहद भावुक और प्रभावशाली रहा। यह एक ऐसा दुर्लभ पल है जब पूरी फिल्म इंडस्ट्री किसी कहानी से इतनी गहराई से प्रभावित नजर आई है। पिच्चैकरण की शानदार सफलता के बाद, निर्देशक ससी और अभिनेता-निर्माता विजय एंटनी ने इस प्रोजेक्ट के लिए फिर से हाथ मिलाया है, जिसकी कहानी वास्तविक जीवन की घटनाओं से प्रेरित है। कल रिलीज हुई इस फिल्म में स्वासिका ने मुख्य भूमिका निभाई है, साथ ही लिजोमोल जोस, करुणास, अजय दिशान और बालाजी शक्तिवेल जैसे कलाकारों ने भी बेहतरीन काम किया है।

पर्दे पर संवेदनशीलता की ताकत

फिल्म को मिली प्रतिक्रिया बेहद तेज और व्यक्तिगत है। ट्रेलर को मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर, यह फिल्म इंडस्ट्री में एक अनूठी चर्चा पैदा कर रही है। हाल ही में एक कार्यक्रम में निर्देशक मिस्किन ने ससी के पैर छूकर उनके प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया, वहीं आर. पार्थिबन ने अपने यूट्यूब चैनल के लिए एक विशेष इंटरव्यू आयोजित किया और पूरी टीम को फूल भेंट किए।

फिल्मकार हलिता शमीम ने भी इस फिल्म की मार्मिक समीक्षा की है। सोशल मीडिया पर उन्होंने निर्देशक ससी को 'सौ सलाम' देते हुए कहा कि उन्होंने उन पीढ़ियों पुराने बोझों को उठाया है जो अनगिनत महिलाओं और परिवारों पर आज भी भारी हैं। शमीम के लिए, फिल्म की ताकत घरेलू बातचीत के बंद दरवाजों को खोलने में है। उन्होंने कहा, "सिनेमा तब सबसे बेहतर होता है जब वह उन कठिन विषयों पर बातचीत का जरिया बनता है जिन्हें हम अक्सर घर पर नजरअंदाज कर देते हैं।" उन्होंने कहा कि अगर यह फिल्म परिवारों को अपने लिए बेहतर सपोर्ट सिस्टम चुनने में मदद करती है, तो इसने अपना बड़ा उद्देश्य हासिल कर लिया है।

यह क्यों मायने रखता है: नैरेटिव में बदलाव

नूरु सामी के लिए इंडस्ट्री में मिल रही यह सराहना समकालीन सिनेमा में एक बड़े बदलाव का संकेत है। जब निर्देशक और अभिनेता केवल प्रचार की औपचारिकता से ऊपर उठकर फिल्म की मूल विषय-वस्तु से जुड़ते हैं, तो यह 'सचेत' कहानी कहने की भूख को दर्शाता है। ससी अपनी यथार्थवादी शैली के लिए जाने जाते हैं, लेकिन सामाजिक अपेक्षाओं के कठोर चक्र को संबोधित करने वाला विषय चुनकर उन्होंने इस फिल्म को सांस्कृतिक बहस का उत्प्रेरक बना दिया है।

इसका सीधा मतलब यह है कि दर्शक और फिल्म जगत के लोग ऐसी फिल्मों के लिए तैयार हैं जो घर का आईना दिखाती हैं। दिखावे वाली कहानियों से हटकर, महिलाओं के रोजमर्रा के संघर्षों के प्रति 'गहरी संवेदनशीलता' दिखाने वाली नूरु सामी की टीम ने एक ऐसी भावना को छुआ है जो बॉक्स ऑफिस से कहीं आगे तक जाती है। क्या यह फिल्म उन 'कठोर चक्रों' को तोड़ने में सफल होगी, यह देखना बाकी है, लेकिन इसने जिस चर्चा को जन्म दिया है, वह क्षेत्रीय सिनेमा के लिए पहले ही एक बड़ी जीत है।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।