अपराध का अखाड़ा बना घर: किशोरों की हिंसा को 'मानसिक बीमारी' मानने से विशेषज्ञों का इनकार
घरेलू झगड़े का नतीजा है हिंसक स्वभाव, यह मानसिक बीमारी नहीं
घरेलू माहौल में किशोरों द्वारा की जाने वाली अत्यधिक हिंसा की घटनाओं को अब क्लीनिकल मनोरोगों के बजाय जहरीले वातावरण से जोड़ा जा रहा है।
गोरखपुर के बांसगांव में हुई भयावह घटना, जहां 16 वर्षीय किशोर पर अपने ही परिवार के तीन सदस्यों—भाई, भाभी और भतीजे—की हत्या का आरोप है, ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। हालांकि ऐसी क्रूर घटनाएं अक्सर तुरंत मनोरोग उपचार की मांग को जन्म देती हैं, लेकिन विशेषज्ञ इस नैरेटिव को खारिज कर रहे हैं कि ये घटनाएं अनिवार्य रूप से किसी मानसिक बीमारी का परिणाम हैं। जांच के एक प्राथमिक स्रोत के रूप में, मनोरोग और समाजशास्त्रीय आकलन एक अधिक असहज सच्चाई की ओर इशारा करते हैं: यह हिंसा लंबे समय तक चले घरेलू तनाव की अभिव्यक्ति है।
क्लीनिकल निदान से परे
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ क्लीनिकल डिसऑर्डर और जहरीले वातावरण के प्रति मानवीय प्रतिक्रिया के बीच के अंतर को स्पष्ट कर रहे हैं। मनोरोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. अमिल हयात खान का कहना है कि किशोर की हरकतें लगातार चल रहे घरेलू कलह का चरम बिंदु प्रतीत होती हैं। विशेषज्ञों की नजर में, लड़के का मन संभवतः गुस्से से भरा हुआ था, जो ऐसे घरेलू माहौल का परिणाम है जहां संघर्ष सामान्य हो गया था। मनोरोग विभाग के प्रमुख डॉ. तापस ऐच का कहना है कि हालांकि किसी भी गंभीर विकृति को खारिज करने के लिए औपचारिक मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन अनिवार्य है, लेकिन प्रारंभिक रिपोर्ट किसी पूर्व-मौजूद क्लीनिकल स्थिति का संकेत नहीं देती हैं।
भावनात्मक साक्षरता का क्षरण
इस मूल लेख और विभिन्न मीडिया आउटलेट्स की रिपोर्टिंग से जो व्यापक पैटर्न उभर रहा है, वह सामाजिक ढांचे की विफलता है। दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के डॉ. मनीष कुमार पांडेय का तर्क है कि हम खंडित पारिवारिक संरचनाओं और नैतिक शिक्षा में गिरावट का प्रभाव देख रहे हैं। जब किशोरों को बिना किसी सपोर्ट सिस्टम के आधुनिक जीवन के दबावों से जूझना पड़ता है, तो छोटी-छोटी शिकायतें विस्फोटक और आवेगी कृत्यों में बदल सकती हैं। यह केवल इस बारे में नहीं है कि घर के अंदर क्या हो रहा है; यह सामुदायिक जिम्मेदारी की कमी और युवाओं के लिए भावनात्मक आउटलेट के अभाव के बारे में है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: बड़ी तस्वीर
यह घटना इस बात का दुखद संकेत है कि कैसे हिंसा सार्वजनिक स्थानों से हमारे जीवन के सबसे निजी और अंतरंग क्षेत्रों में प्रवेश कर गई है। इन घटनाओं का न्यूजव्रैप एक ऐसे समाज को दर्शाता है जो "भावनात्मक निरक्षरता" से जूझ रहा है। जब कोई किशोर उस स्तर पर पहुंच जाता है जहां वह आंतरिक संघर्ष के समाधान के रूप में हत्या को देखता है, तो यह दर्शाता है कि पीढ़ियों के बीच संवाद पूरी तरह से टूट चुका है। अपराध को कानूनी रूप से संबोधित करना जनादेश का केवल एक हिस्सा है; असली चुनौती यह है कि क्या हमारे स्कूल और घर उस भावनात्मक बुद्धिमत्ता को बढ़ावा दे सकते हैं जो ऐसी प्रवृत्तियों को शुरू में ही रोकने के लिए आवश्यक है। यदि हम सक्रिय हस्तक्षेप और सुधारात्मक पारिवारिक संचार की ओर नहीं बढ़े, तो हम ऐसी और भी दुखद और रोकी जा सकने वाली घटनाओं का जोखिम उठाएंगे।
पैटर्न का विश्लेषण
हिंदी समाचार चक्र और क्षेत्रीय मीडिया की हेडलाइंस ने घटना के सदमे पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित किया है, लेकिन अंतर्निहित डेटा युवाओं में आवेग नियंत्रण (इम्पल्स कंट्रोल) के बढ़ते संकट का सुझाव देता है। विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि ये किशोर अक्सर निरंतर आंतरिक द्वंद्व की स्थिति में रहते हैं, जहां वे खुद को नुकसान पहुंचाने के विचारों और दूसरों को नुकसान पहुंचाने की इच्छा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं। इन्हें "मानसिक बीमारी" का लेबल देकर, हम मूल कारण को अनदेखा करने का जोखिम उठाते हैं: एक ऐसा वातावरण जो बच्चों को दुख, हताशा और गुस्से को प्रोसेस करना नहीं सिखाता है।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।