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एक स्वर्णिम युग का अंत: शूटिंग के दिग्गज जसपाल राणा का शांत विदाई

पूर्व एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता जसपाल राणा का 49 वर्ष की आयु में निधन

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 12 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
एक स्वर्णिम युग का अंत: शूटिंग के दिग्गज जसपाल राणा का शांत विदाई
एक स्वर्णिम युग का अंत: शूटिंग के दिग्गज जसपाल राणा का शांत विदाई

भारतीय खेल जगत शोक में डूबा है। देश के हाई-परफॉर्मेंस कोच जसपाल राणा का 49 वर्ष की आयु में निधन हो गया है, जो अपने पीछे सटीकता और दृढ़ संकल्प की एक अमिट विरासत छोड़ गए हैं।

शुक्रवार सुबह शूटिंग रेंज से आई यह खबर एक भारी और अविश्वसनीय सन्नाटा लेकर आई है। जसपाल राणा, जिन्होंने भारतीय पिस्टल शूटिंग को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने में शायद किसी और से अधिक योगदान दिया था, अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका निधन अचानक बिगड़ी तबीयत के बाद हुआ; म्यूनिख, जर्मनी में ISSF वर्ल्ड कप से वापसी की उड़ान के दौरान वे बीमार पड़ गए थे और बाद में हुई एक मेडिकल प्रक्रिया के बाद वे पूरी तरह उबर नहीं सके।

जो लोग उनके करियर को करीब से जानते थे, उनके लिए राणा सिर्फ एक कोच नहीं थे—वे दो युगों के बीच एक सेतु थे। 1976 में जन्मे राणा ने सबसे पहले शूटिंग रेंज में एक 'वंडरकिंड' के रूप में देश का ध्यान खींचा था। उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स के चार संस्करणों में 9 स्वर्ण सहित कुल 15 पदक जीते। एशियाई खेलों में उनके प्रदर्शन ने उन्हें एक किंवदंती के रूप में स्थापित किया, लेकिन एक कोच के रूप में उनकी भूमिका ने खेल पर सबसे गहरा प्रभाव डाला।

आधुनिक सफलता के शिल्पकार

अगर 2024 पेरिस ओलंपिक में मनु भाकर का दो कांस्य पदक जीतना भारतीय शूटिंग के लिए एक मील का पत्थर था, तो इसका बहुत बड़ा श्रेय पर्दे के पीछे मौजूद उस व्यक्ति को जाता है: जसपाल राणा। वे एक ऐसे मेंटर थे जो पूर्णता की मांग करते थे और पोडियम के भारी मानसिक दबाव को बखूबी समझते थे। अपनी प्रतिस्पर्धी ऊर्जा को तकनीकी मार्गदर्शन में बदलने की उनकी क्षमता ने भारतीय निशानेबाजों की नई पीढ़ी को उस 'नियर-मिस' सिंड्रोम से बाहर निकाला, जिसने लंबे समय से भारतीय दल को परेशान कर रखा था।

उनके पुरस्कारों की सूची उनकी कहानी का केवल आधा हिस्सा बयां करती है। 1994 में अर्जुन पुरस्कार, 1997 में पद्म श्री और 2020 में द्रोणाचार्य पुरस्कार उनके दशकों लंबे करियर की आधिकारिक मान्यताएं थीं। फिर भी, उनके साथी और छात्र अक्सर उनके अथक परिश्रम की बात करते थे। चाहे 90 के दशक के मध्य में एक युवा निशानेबाज के रूप में हो या पेरिस खेलों के दौरान टीम का मार्गदर्शन करने वाले अनुभवी कोच के रूप में, राणा हमेशा खेल की बारीकियों पर पूरी तरह केंद्रित रहे।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

जसपाल राणा का जाना भारतीय ओलंपिक इकोसिस्टम में एक ऐसा शून्य छोड़ गया है जिसे भरना मुश्किल होगा। पदकों से परे, उनका निधन हमारे खेल बुनियादी ढांचे की नाजुकता को उजागर करता है। हम अक्सर खेलों में अपने एथलीटों की सफलता का जश्न मनाते हैं, लेकिन हम शायद ही कभी उस कठिन और तनावपूर्ण जीवनशैली पर चर्चा करते हैं जिसे राणा जैसे कोच सहन करते हैं—लगातार यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का तनाव और एलीट प्रदर्शन के लिए समर्पित जीवन का शारीरिक बोझ।

उनका जाना यह याद दिलाता है कि भारत में खेलों का विकास उन चुनिंदा व्यक्तियों पर निर्भर है जो पूरे अनुशासन का संस्थागत ज्ञान अपने साथ रखते हैं। जैसे-जैसे भारतीय शूटिंग दल अपने अगले चक्र की तैयारी कर रहा है, वे अपने सबसे अनुभवी शिल्पकार के बिना ऐसा करेंगे। खेल प्रशासकों के लिए अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि राणा द्वारा स्थापित प्रणालियाँ उनके न रहने पर भी न लड़खड़ाएं, और प्रशिक्षण के प्रति उनका सूक्ष्म दृष्टिकोण आने वाली पीढ़ियों के लिए मानक बन जाए।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।