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स्टेशनरी का गुलदस्ता: खंडवा विधायक के इस अनोखे अंदाज ने जीता राष्ट्रपति का दिल

'इसे गरीब बच्चों में बांट दीजिए', विधायक का अनोखा गिफ्ट देखकर खुश हो गईं राष्ट्रपति, बहुत देर तक देखती रह गईं

द्वारा रोहन गुप्ताप्रकाशित 22 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
स्टेशनरी का गुलदस्ता: खंडवा विधायक के इस अनोखे अंदाज ने जीता राष्ट्रपति का दिल
स्टेशनरी का गुलदस्ता: खंडवा विधायक के इस अनोखे अंदाज ने जीता राष्ट्रपति का दिल

पारंपरिक स्वागत के तरीकों से हटकर, खंडवा विधायक कंचन मुकेश तन्वे द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को स्टेशनरी से बना गुलदस्ता भेंट करना, प्रोटोकॉल से ऊपर शिक्षा को प्राथमिकता देने की चर्चा का विषय बन गया है।

ओंकारेश्वर में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का आगमन खंडवा के इतिहास में एक दुर्लभ क्षण था—साल 2002 में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यात्रा के 24 साल बाद यह किसी राष्ट्रपति का पहला दौरा था। जहां प्रशासनिक स्वागत सामान्य था, वहीं स्थानीय विधायक कंचन मुकेश तन्वे का अंदाज सबसे अलग रहा। सरकारी स्वागत समारोहों में अक्सर इस्तेमाल होने वाले फूलों के गुलदस्तों के बजाय, तन्वे ने राष्ट्रपति को पेन, पेंसिल, इरेज़र और नोटबुक से बना एक रचनात्मक गुलदस्ता भेंट किया।

यह दृश्य काफी प्रभावशाली था। जब राष्ट्रपति गणमान्य व्यक्तियों से मिल रही थीं, तो वे तन्वे के पास रुक गईं। राष्ट्रपति ने लगभग 44 सेकंड तक विधायक से बात की और वे इस अनोखे उपहार को देखकर काफी प्रभावित दिखीं। तन्वे ने बताया कि यह गुलदस्ता शिक्षा के महत्व का प्रतीक है—एक ऐसा अभियान जिसे वे लंबे समय से चला रही हैं, जिसमें वे समर्थकों से महंगे जन्मदिन के उपहारों के बजाय स्टेशनरी देने का आग्रह करती हैं, ताकि उन्हें जरूरतमंद बच्चों में बांटा जा सके।

प्रोटोकॉल से परे एक संदेश

राष्ट्रपति मुर्मू की प्रतिक्रिया में स्पष्ट सराहना झलक रही थी। उन्होंने न केवल उपहार स्वीकार किया, बल्कि उसे ध्यान से देखा, उसके साथ फोटो खिंचवाई और फिर विधायक को एक विशेष निर्देश देते हुए कहा: "इसे गरीब बच्चों में बांट दीजिए"। इस निर्देश ने एक सामान्य औपचारिक आदान-प्रदान को सामाजिक कल्याण के एक सार्थक कार्य में बदल दिया।

इस घटना पर नजर रखने वालों के लिए, यह सार्वजनिक जीवन में दिखावे की संस्कृति पर एक मूक प्रहार है। जहां Eenadu और Andhrajyothy जैसे मीडिया संस्थान अन्य राज्यों के व्यापक राजनीतिक एजेंडे को कवर करते हैं, वहीं मध्य प्रदेश की यह घटना दर्शाती है कि कैसे जमीनी स्तर के प्रतिनिधि अपनी पहुंच का उपयोग समाज के लिए कर रहे हैं।

बड़ी तस्वीर: यह क्यों मायने रखता है

यह केवल एक रचनात्मक पीआर का क्षण नहीं है। लोक प्रशासन के संदर्भ में, हम 'दिखावे की राजनीति' से 'प्रभाव-आधारित राजनीति' की ओर एक क्रमिक बदलाव देख रहे हैं। जब राष्ट्रपति जैसी उच्च पदस्थ हस्ती पारंपरिक गुलदस्ते के बजाय सामाजिक कार्य को महत्व देती है, तो यह पूरे प्रशासनिक तंत्र को एक संदेश देता है। यह संकेत देता है कि अधिकारियों से अब केवल औपचारिकताएं निभाने की नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार का माध्यम बनने की उम्मीद की जाती है।

क्या यह चलन आगे भी बना रहेगा या यह एक अकेली घटना है, यह स्थानीय नेताओं की प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगा। हालांकि, राष्ट्रपति—जिन्होंने अक्सर आदिवासी और ग्रामीण उत्थान में शिक्षा की भूमिका पर जोर दिया है—का फूलों के बजाय स्टेशनरी को बढ़ावा देना एक मिसाल कायम करता है। यह 'फूलों की बर्बादी' वाली संस्कृति को चुनौती देता है और प्रतिनिधियों की छवि को उनके मतदाताओं की जरूरतों के साथ अधिक गहराई से जोड़ता है।

द्वारा रोहन गुप्ता
बिज़नेस संवाददाता

रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।