झारखंड का 'किंगमेकर' उलटफेर: परिमल नथवानी की जीत ने कैसे हिलाया सत्ता का गलियारा
कौन हैं परिमल नाथवानी, जिन्होंने तोड़ा राहुल-हेमंत का चक्रव्यूह, बिहार-एमपी के बाद झारखंड में भी खिला कमल
झारखंड राज्यसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवानी की अप्रत्याशित जीत ने राज्य की राजनीति में हेमंत सोरेन और कांग्रेस गठबंधन की घेराबंदी को ध्वस्त कर दिया है।
रांची के सत्ता के गलियारों में जो चर्चा पिछले कई दिनों से दबी जुबान में चल रही थी, वह मंगलवार को चुनावी नतीजों के साथ हकीकत में बदल गई। झारखंड की राज्यसभा सीटों के लिए हुए मुकाबले में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरे उद्योगपति परिमल नथवानी ने जीत का परचम लहराया है। यह महज एक चुनाव परिणाम नहीं है, बल्कि उस 'चक्रव्यूह' के टूटने की कहानी है जिसे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कांग्रेस आलाकमान ने अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए बुना था।
संख्या बल बनाम प्रबंधन
कागजी आंकड़ों को देखें तो सत्ताधारी गठबंधन यानी झामुमो और कांग्रेस के पास विधानसभा में स्पष्ट बहुमत था। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने सुनिश्चित किया था कि उनके खेमे में कोई सेंध न लगे, जिसके लिए विधायकों की सख्त निगरानी भी की गई। लेकिन मतदान के दिन जो तस्वीर उभरी, वह रणनीतिक प्रबंधन के आगे संख्या बल के बेअसर होने का सबूत थी। एनडीए समर्थित उम्मीदवार के रूप में परिमल नथवानी ने न केवल विपक्ष की घेराबंदी को तोड़ा, बल्कि राज्य की राजनीति में अपनी गहरी पैठ का अहसास भी करा दिया।
परिमल नथवानी: एक अनुभवी खिलाड़ी
राजनीति के गलियारों में परिमल नथवानी कोई नया नाम नहीं हैं। गुजरात के प्रमुख उद्योगपतियों में शुमार नथवानी का सफर 2008 में शुरू हुआ था, जब वे पहली बार झारखंड से राज्यसभा पहुंचे। 2014 में भी उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की थी और बाद में 2020 में वाईएसआर कांग्रेस के साथ आंध्र प्रदेश से उच्च सदन का प्रतिनिधित्व किया। द्वारकाधीश देवस्थान समिति के उपाध्यक्ष के तौर पर भी सक्रिय रहने वाले नथवानी अपनी बेजोड़ चुनावी नेटवर्किंग के लिए जाने जाते हैं, जिसने इस बार भी उन्हें जीत की दहलीज के पार पहुंचा दिया।
सत्ता का बदलता समीकरण
क्यों मायने रखती है यह जीत
यह चुनाव केवल एक सीट का नहीं, बल्कि एनडीए की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जो हाल ही में मध्य प्रदेश और बिहार में भी देखने को मिली थी। झारखंड का यह परिणाम यह संकेत देता है कि गठबंधन की आंतरिक कलह और एनडीए का सूक्ष्म चुनावी प्रबंधन विपक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। राहुल गांधी और हेमंत सोरेन की इस हार ने इंडिया गठबंधन के सामने अपनी रणनीति को फिर से परखने का दबाव बढ़ा दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह 'झारखंड मॉडल' विपक्ष के भविष्य के चुनावी गणित को और अधिक जटिल बना देगा।
Priya Nair covers parties, elections and the business of power for PoliticalPedia.