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रामजी का खेत और चिड़िया की लूट: मंदिर चढ़ावे पर मचे घमासान की असलियत

मंदिर चढ़ावा चोरी: चिड़िया रामभक्त का नाम सार्थक करते हुए रामजी का खेत चुग रही है!

By Arjun MehtaPublished 5 July 2026· 3 min read
रामजी का खेत और चिड़िया की लूट: मंदिर चढ़ावे पर मचे घमासान की असलियत
रामजी का खेत और चिड़िया की लूट: मंदिर चढ़ावे पर मचे घमासान की असलियत

अयोध्या में श्री रामजन्मभूमि मंदिर से जुड़ी हालिया गबन और चोरी की खबरें आस्था के नाम पर चल रहे आर्थिक भ्रष्टाचार और प्रबंधन की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े कर रही हैं।

जब आस्था के आंगन में सेंध लगे

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने दशकों पहले अपनी कविता 'आराधना' में लिखा था कि राम के नाम से धन, धान और धाम तो संवर सकते हैं, लेकिन राम तक पहुंचने के लिए कोई 'दाम' यानी मूल्य नहीं होना चाहिए। आज, जब श्री रामजन्मभूमि मंदिर अयोध्या से जुड़ी चोरी और गबन की खबरें सामने आ रही हैं, तो निराला की वे पंक्तियां एक कड़वी सच्चाई बनकर उभर रही हैं। जहां भक्ति और श्रद्धा का केंद्र होना चाहिए था, वहां अब 'दाम' यानी धन के लालच ने एक ऐसा माहौल बना दिया है जहां मंदिर का खजाना ही असुरक्षित है। यह महज एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि आस्था के उस ढांचे में आई दरार है जिसे बहुत जतन से खड़ा किया गया था।

मौन का अर्थशास्त्र

दिलचस्प यह है कि इस भ्रष्टाचार के सामने आने के बाद 'रामभक्तों' की वह आक्रामक फौज, जो सामान्यतः हर छोटी बात पर मुखर रहती है, पूरी तरह खामोश है। जो राजनेता मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के दौरान साष्टांग दंडवत कर रहे थे, वे आज इस गबन पर चुप्पी साधे हुए हैं। क्या इसे एक सोची-समझी रणनीति मानें या फिर यह मान लिया गया है कि मंदिर की देखरेख अब राम खुद कर लेंगे? यह खामोशी उस विरोधाभास को दर्शाती है जहां राजनीतिक लाभ के लिए तो राम का नाम लिया गया, लेकिन उनके नाम पर हो रहे कुप्रबंधन पर बोलने से बचा जा रहा है।

चिड़िया और खेत का पुराना खेल

लोककथाओं में कहा जाता है, "रामजी की चिड़िया, रामजी का खेत, खा लो चिड़िया भर-भर पेट।" आज इस मुहावरे के निहितार्थ बदल गए हैं। मंदिर के प्रबंधक और सेवादार अब 'रामभक्त' होने का दम तो भरते हैं, लेकिन असल में वे उस खेत को ही चुग रहे हैं जिसकी रक्षा की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई थी। जब मंदिर जैसे पवित्र स्थान पर चढ़ावे की चोरी की घटनाएं सामान्य हो जाएं, तो यह संकेत है कि व्यवस्था में शुचिता का अभाव है। यह केवल एक खबर नहीं, बल्कि एक पैटर्न है—जहां धन होता है, वहां विवाद और चोरी की संभावना जन्म लेती है, और राम मंदिर भी अब इस सांसारिक सच्चाई से अछूता नहीं रहा।

क्यों मायने रखता है यह घटनाक्रम

यह पूरा प्रकरण केवल वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं है; यह उस बड़े सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करता है जिसे मंदिर निर्माण के साथ जोड़ा गया था। जब एक संस्था 'आस्था' के नाम पर जवाबदेही से मुक्त होने की कोशिश करती है, तो वहां पारदर्शिता का खत्म होना तय है। यदि मंदिर का प्रबंधन चढ़ावे के धन को ही सुरक्षित नहीं रख पा रहा, तो यह उन करोड़ों लोगों के विश्वास का अपमान है जिन्होंने श्रद्धा के साथ वहां दान दिया। भविष्य में, ऐसी घटनाएं मंदिर की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा सकती हैं, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि आस्था के नाम पर दी गई 'स्वतंत्रता' कहीं अराजकता का रूप तो नहीं ले रही।

By Arjun Mehta
National Affairs Correspondent

Arjun Mehta reports on government, policy and Parliament for PoliticalPedia, in English and Hindi.