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भागीरथ चौधरी का खीरा फार्म और 99 लाख की सब्सिडी: सरकारी योजनाओं में हितों के टकराव का बड़ा सवाल

भगीरथ चौधरी ने अपने ही मंत्रालय से ली 99 लाख रुपये की सब्सिडी? अब हंगामे के आसार

By Rohan GuptaPublished 27 June 2026· 2 min read
भागीरथ चौधरी का खीरा फार्म और 99 लाख की सब्सिडी: सरकारी योजनाओं में हितों के टकराव का बड़ा सवाल
भागीरथ चौधरी का खीरा फार्म और 99 लाख की सब्सिडी: सरकारी योजनाओं में हितों के टकराव का बड़ा सवाल

केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी द्वारा अपने ही मंत्रालय की योजना से लाखों की सब्सिडी हासिल करने के बाद राजनीतिक गलियारों में उठ रहे हैं गंभीर सवाल।

राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के पीह गांव में स्थित एक पॉलीहाउस फार्म इस वक्त चर्चा का केंद्र बन गया है। इस फार्म के मालिक कोई और नहीं, बल्कि केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी हैं। हालिया खुलासों के मुताबिक, मंत्री ने 'मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर' (MIDH) के तहत अपने खीरे की खेती के प्रोजेक्ट के लिए सरकारी खजाने से लगभग 99.60 लाख रुपये की सब्सिडी मंजूर कराई है। नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड (NHB) द्वारा दी गई यह राशि प्रोजेक्ट की कुल लागत का 50 फीसदी हिस्सा है।

सब्सिडी का गणित और प्रक्रिया

आंकड़ों पर गौर करें तो यह पूरा मामला बेहद तेजी से आगे बढ़ा। अप्रैल 2025 में आवेदन दाखिल होने के मात्र 14 दिन के भीतर इसे 'इन-प्रिंसिपल' मंजूरी मिल गई। मार्च 2026 तक अंतिम स्वीकृति मिलते ही 30 मार्च 2026 को HDFC बैंक में स्थित उनके लोन खाते में 99.03 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए गए। यह प्रोजेक्ट कुल 1.99 करोड़ रुपये का है, जिसमें 1.49 करोड़ रुपये का बैंक ऋण शामिल है। दिलचस्प बात यह है कि साल 2018 में भी चौधरी और उनके बेटे ने इसी योजना के लिए आवेदन किया था, जिसे उस समय खारिज कर दिया गया था।

हितों के टकराव का मुद्दा

सवाल सब्सिडी की पात्रता पर नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक नैतिकता पर उठ रहे हैं। भागीरथ चौधरी स्वयं नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड के एक्स-ऑफिशियो उपाध्यक्ष हैं। हालांकि आधिकारिक तौर पर उनकी बोर्ड की फैसलों में कोई सीधी भूमिका नहीं बताई गई है, लेकिन जिस मंत्रालय का वे हिस्सा हैं, उसी के अधीन चलने वाली बोर्ड की योजना का लाभ लेना 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) की श्रेणी में आता है। इसके अलावा, मार्च 2025 में प्रधानमंत्री कार्यालय को दी गई उनकी संपत्ति की घोषणा में इस प्रोजेक्ट का उल्लेख न होना भी पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रहा है।

क्यों मायने रखता है यह मामला

यह घटना सरकारी तंत्र में 'संसाधन आवंटन' और 'जवाबदेही' के बीच की धुंधली रेखा को उजागर करती है। MIDH जैसी योजनाएं छोटे और मझोले किसानों को व्यावसायिक खेती की ओर प्रोत्साहित करने के लिए बनाई गई हैं। जब सरकार में उच्च पदों पर बैठे व्यक्ति ही इन योजनाओं के लाभार्थी बनते हैं, तो यह जनता के बीच उस भरोसे को कम करता है जिस पर सरकारी नीतियां टिकी होती हैं।

भले ही कागजों पर यह प्रक्रिया नियमों के दायरे में दिखती हो, लेकिन सार्वजनिक जीवन में 'औचित्य' का पैमाना कानून से ऊपर होता है। क्या एक मंत्री को अपने ही प्रभाव वाले विभाग से वित्तीय लाभ लेना चाहिए? यह सवाल न केवल राजनीतिक है, बल्कि प्रशासनिक नैतिकता का भी है। जैसे-जैसे यह मामला विभिन्न माध्यमों और सोशल मीडिया पर तूल पकड़ रहा है, सरकार के लिए इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट करना अनिवार्य हो गया है।

By Rohan Gupta
Business Correspondent

Rohan Gupta covers the economy, markets and companies for PoliticalPedia.